Thursday, August 5, 2021

 धुवां उठा ,आग लागी

आसमांतक लपट गाई

और फ़िरसे खांक हुई

एक चिंगरी पडी  वहीं

रात भर वो जगती राही

अंखोपेसे धुल हटाकर

असमान को तख्ती राही

जां नाहीं थी उसमें कुछभी

हलकी हवापे भी गुरांती

जरा चमकती ,फिर बुझ जाती

अपने मन को खुद बहलाती

फिर अंधेरा जायेगा

नई रोशनी लायेगा

मैं फिर ज्योत बन जाऊंगी

इसी हवापे लहराउंगी

खुद ही पे इतराउंगी

बस कुछ देर की बात हैं

कुछ पल ही की तो रात हैं


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