कभी कभी सोचता हूँ
मैं "तुम" बन जाऊँ ......
न जाने तब शायद
मैं तुम्हे समझ पाऊं.......
वो तुम्हारे मन की
सागर सी गहराई .....
इरादों के चट्टानों की
आसमाँ सी ऊँचाई .....
छोटी-मोटी बांतें सारी
एसे ही सह लेना.....
कितनी भी हों बड़ी बात
उसे यूंही सुलझा देना .....
आबड़ धबड़ राहों मे
खुद हि संभल जाना.....
फिसले गर पाँव मेरा
तो मुझे भी संभाल लेना....
और भी हैं बातें कई
जिन्हें मैं सराह पाऊं.....
बस इंसी लिए सोचता हूं
एक दिन.....
मैं तुम बन जाऊं.....
08/03/2023 14:55
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